राजस्थान में पंचायत चुनाव: आखिर क्यों नहीं हो सके समय पर चुनाव?

जनवरी 2025 में होने थे चुनाव, अब नवंबर 2026 तक पहुंचा कार्यक्रम; जानिए दो साल की देरी की पूरी कहानी
राजस्थान की जिन ग्राम पंचायतों में जनवरी, 2025 में चुनाव होने थे, वहां से शुरू हुई यह देरी अब अक्टूबर -नवंबर 2026 तक पहुंच गई है। इस पूरी अवधि में गांवों की निर्वाचित सरकारों (ग्राम पंचायत , पंचायत समिति और जिला परिषद् ) की जगह प्रशासकीय व्यवस्था रही। अब चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद ग्रामीण मतदाताओं को नई पंचायत चुनने का अवसर मिल रहा है।
राजस्थान में पंचायत चुनाव की देरी के पीछे एक नहीं, बल्कि कई कारण रहे। शुरुआत में राजस्थान की भजनलाल सरकार ने ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की योजना और पंचायतों के पुनर्गठन को आधार बनाया। नए जिलों के गठन और बाद में नौ जिलों को समाप्त करने के फैसले से प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण का काम बढ़ा। परिसीमन के प्रस्तावों की जांच और उन पर आपत्तियों के निस्तारण में समय लगा।
इसके बाद ओबीसी राजनीतिक आरक्षण के लिए आवश्यक सर्वेक्षण और प्रामाणिक आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया लंबी खिंच गई। आयोग को मिले आंकड़ों में त्रुटियां मिलने से उसकी रिपोर्ट कई बार आगे बढ़ी। नगरीय निकायों के परिसीमन से जुड़े न्यायिक विवादों ने भी चुनावी तैयारियों को प्रभावित किया।
दूसरी ओर, हाईकोर्ट लगातार चुनाव कराने की समय-सीमा तय करता रहा। राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग ने समय बढ़ाने की मांग की, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रिया और आयोग की रिपोर्ट में देरी लोकतांत्रिक चुनाव को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकती।

चुप्पी तोड़
जयपुर। राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव का इंतजार कर रहे ग्रामीण मतदाताओं को करीब दो साल से नई सरकार चुनने का अवसर नहीं मिला है। जिन ग्राम पंचायतों में जनवरी 2025 में चुनाव होने थे, वहां निर्वाचित सरपंचों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। सरकार ने चुनाव टालने के पीछे पंचायतों के पुनर्गठन, परिसीमन, ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की तैयारी और प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया। बाद में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के राजनीतिक आरक्षण का निर्धारण भी चुनाव प्रक्रिया में बड़ी बाधा बन गया।
इस बीच मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने कई बार राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से चुनाव कराने की समय-सीमा पूछी और कड़ी फटकार के बाद अंततः चुनाव पूरा करने के लिए तारीखें तय कीं। सरकार ने अदालत में शपथ पत्र देकर चुनाव की नई समय-सारणी प्रस्तुत की, लेकिन ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और आरक्षण लॉटरी में देरी के चलते प्रक्रिया आगे खिसकती रही। अब राज्य निर्वाचन आयोग चार चरणों में पंचायत चुनाव करा रहा है।
जनवरी 2025: चुनाव के बजाय निवर्तमान सरपंचों को बनाया प्रशासक
राजस्थान की 6,759 ग्राम पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल जनवरी 2025 में समाप्त हो रहा था। इनमें कई ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 17 जनवरी को पूरा होना था, जबकि शेष का कार्यकाल 31 जनवरी तक समाप्त होना था। इन पंचायतों में नए चुनाव कराने की तैयारी के बीच राज्य सरकार ने 16 जनवरी 2025 को चुनाव नहीं कराने का निर्णय लिया।
पंचायती राज विभाग ने राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 95 के तहत आदेश जारी कर कार्यकाल समाप्त होने वाली ग्राम पंचायतों में निवर्तमान सरपंचों को प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय किया। उनकी सहायता के लिए प्रशासनिक समितियां गठित करने का भी प्रावधान किया गया। इन समितियों में निवर्तमान उपसरपंच और वार्ड पंचों को शामिल किया जाना था।
इस व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायतों का दैनिक कामकाज जारी रखने की जिम्मेदारी प्रशासकों को सौंपी गई। सरकार के इस फैसले से गांवों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह प्रशासनिक व्यवस्था लागू हो गई।
सरकार ने चुनाव टालने के पीछे पंचायतों के पुनर्गठन और नगरीय निकायों के साथ चुनाव कराने की योजना को प्रमुख कारण बताया। सरकार ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की अवधारणा पर भी काम करना चाहती थी। यानी अलग-अलग समय पर होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों के बजाय उन्हें एक साथ कराने की संभावना तलाशना।
हालांकि, जनवरी में जारी आदेश में चुनाव नहीं कराने के लिए ‘अपरिहार्य कारणों’ का उल्लेख किया गया था। ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ और पुनर्गठन को सरकार ने बाद में अदालत में अपने फैसले के समर्थन में विस्तार से रखा।
जनवरी-फरवरी 2025: पंचायतों के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू
चुनाव टालने के साथ ही सरकार ने ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों के पुनर्गठन की प्रक्रिया भी शुरू की। 16 जनवरी को जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार 20 जनवरी से नई ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों के गठन तथा मौजूदा संस्थाओं की सीमाओं में बदलाव के प्रस्ताव तैयार किए जाने थे।
इस प्रक्रिया में जिला कलेक्टरों को प्रस्ताव तैयार करने, आपत्तियां आमंत्रित करने और उनके निस्तारण के बाद प्रस्ताव सरकार को भेजने की जिम्मेदारी दी गई।
इसी दौरान राज्य में जिलों के पुनर्गठन का मुद्दा भी सामने आया। दिसंबर 2024 में सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार की ओर से बनाए गए 17 नए जिलों में से नौ को समाप्त करने का निर्णय किया था। इससे प्रशासनिक सीमाओं और ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्गठन का काम प्रभावित हुआ।
सरकार का तर्क था कि जिला परिषदों, पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों की सीमाएं तय किए बिना चुनाव कराने से प्रशासनिक और भौगोलिक विसंगतियां पैदा हो सकती हैं।
फरवरी 2025: पंचायत चुनाव का मामला हाईकोर्ट पहुंचा
चुनाव टालने और निवर्तमान सरपंचों को प्रशासक नियुक्त करने के सरकारी फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव कराना संवैधानिक जिम्मेदारी है। चुनाव नहीं कराकर निवर्तमान सरपंचों को प्रशासक नियुक्त करना उचित नहीं है।
4 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट ने सरकार से पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा बताने को कहा। इसके बाद 26 फरवरी को सरकार ने अदालत में अपना जवाब पेश किया।
सरकार ने जवाब में ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की योजना, पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन का हवाला दिया। सरकार का कहना था कि पूर्ववर्ती सरकार की ओर से बनाए गए नए जिलों में से नौ को समाप्त करने के बाद जिला सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना जरूरी था। इसके साथ ही पंचायतों और नगरीय निकायों का पुनर्गठन भी किया जा रहा था।
सरकार ने प्रशासक नियुक्त करने के अपने फैसले को पंचायती राज अधिनियम की धारा 95 के तहत उचित बताया।
याचिकाकर्ताओं ने सरकार के जवाब पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अदालत के निर्देश के बावजूद चुनाव कराने की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई गई है।
अप्रैल 2025: हाईकोर्ट ने फिर मांगा चुनाव कार्यक्रम
सरकार की ओर से चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा प्रस्तुत नहीं किए जाने पर हाईकोर्ट ने अप्रैल में फिर सख्ती दिखाई।
2 अप्रैल 2025 को अदालत ने सरकार को 6,759 ग्राम पंचायतों के चुनाव का स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इससे पहले फरवरी में भी सरकार से समय-सारणी मांगी गई थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने जवाब को अस्पष्ट बताया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव नहीं कराना और निवर्तमान सरपंचों को प्रशासक बनाए रखना संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
सरकार ने एक बार फिर ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ और प्रशासनिक पुनर्गठन को देरी का कारण बताया। लेकिन चुनाव की निश्चित तारीख सामने नहीं आई।
मई 2025: ओबीसी राजनीतिक आरक्षण के लिए आयोग का गठन
पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए केवल सामान्य जनसंख्या के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए स्थानीय निकायों में ओबीसी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की स्थिति का समकालीन और तथ्यपरक अध्ययन जरूरी है। इसे ट्रिपल टेस्ट कहा जाता है।
इसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए राजस्थान सरकार ने 9 मई 2025 को राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग का गठन किया। आयोग की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश मदनलाल भाटी को सौंपी गई। आयोग को ओबीसी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन कर आरक्षण संबंधी सिफारिशें देनी थीं।
आयोग के गठन के बाद भी सर्वेक्षण और आंकड़े जुटाने का काम तय समय पर पूरा नहीं हो सका। आयोग को विभिन्न विभागों और जिला स्तर से मिले आंकड़ों में त्रुटियां मिलीं। इस कारण सरकार ने आयोग का कार्यकाल बढ़ाया।
जुलाई-अगस्त 2025: परिसीमन में देरी और प्रशासकों की नियुक्ति पर विवाद
पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया निर्धारित समय में पूरी नहीं हो सकी। 22 जुलाई 2025 को लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने राजस्थान सरकार की ओर से दी गई जानकारी का उल्लेख किया।
इसके अनुसार, पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन के प्रस्तावों को अंतिम रूप देने के लिए 21 मई से 4 जून 2025 तक की समय-सीमा तय की गई थी। लेकिन जिला कलेक्टरों से बड़ी संख्या में प्रस्ताव प्राप्त होने और उनकी जांच में समय लगने के कारण प्रक्रिया लंबित रही। सरकार ने इस काम को 15 अगस्त 2025 तक पूरा करने का अनुमान बताया था।
इसी बीच प्रशासक बनाए गए निवर्तमान सरपंचों को हटाने के फैसले भी विवाद में आ गए। 18 अगस्त 2025 को राजस्थान हाईकोर्ट ने शीशराम दयामा और अन्य बनाम राज्य सरकार के मामले में 17 निवर्तमान सरपंचों को प्रशासक पद से हटाने के आदेश निरस्त कर दिए।
अदालत ने कहा कि संबंधित सरपंचों को सुनवाई का अवसर दिए बिना हटाने की कार्रवाई उचित नहीं थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि परिसीमन के नाम पर पंचायत चुनाव की प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखी जा सकती।
इस फैसले में संविधान के अनुच्छेद 243-E का उल्लेख करते हुए कहा गया कि पंचायतों का कार्यकाल पांच साल का होता है और चुनाव निर्धारित संवैधानिक समय-सीमा के अनुसार कराए जाने चाहिए।
नवंबर 2025: हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने का निर्देश दिया
पंचायतों के परिसीमन और चुनाव में देरी को लेकर कई याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट में लंबित थीं। इन मामलों पर सुनवाई के बाद 14 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
अदालत ने राज्य सरकार को पंचायतों का परिसीमन 31 दिसंबर 2025 तक पूरा करने और इसके बाद पंचायतों तथा नगरीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने का निर्देश दिया। चुनाव की पूरी प्रक्रिया 15 अप्रैल 2026 तक संपन्न करने की समय-सीमा तय की गई।
अदालत ने परिसीमन से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर भी निर्णय दिया। ग्राम पंचायतों के परिसीमन से संबंधित कई चुनौतियां खारिज की गईं और जिला कलेक्टरों को प्रस्ताव राज्य सरकार की उच्चस्तरीय समिति के समक्ष भेजने का निर्देश दिया गया।
इस फैसले के बाद उम्मीद बनी कि अप्रैल 2026 तक प्रदेश में पंचायत चुनाव संपन्न हो जाएंगे।
दिसंबर 2025 से फरवरी 2026: परिसीमन और मतदाता सूची का काम पूरा
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने 19, 20 और 21 नवंबर 2025 को पंचायतों के परिसीमन से संबंधित अधिसूचनाएं जारी कीं। प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर विचार करने के बाद 28 और 31 दिसंबर 2025 को अंतिम अधिसूचनाएं जारी की गईं।
इसके बाद 25 जनवरी 2026 को वार्डों के प्रकाशन से संबंधित निर्देश जारी हुए। राज्य निर्वाचन आयोग ने 31 दिसंबर 2025 को पंचायतों की मतदाता सूची तैयार करने के आदेश जारी किए थे। अंतिम मतदाता सूची 25 फरवरी 2026 को प्रकाशित कर दी गई।
इस तरह पंचायतों के परिसीमन और मतदाता सूची का काम पूरा हो गया। लेकिन नगरीय निकायों के परिसीमन से जुड़े न्यायिक विवाद और ओबीसी आरक्षण का निर्धारण अब भी चुनाव प्रक्रिया में बाधा बने हुए थे।
मार्च 2026: ओबीसी आयोग का कार्यकाल फिर बढ़ा
ओबीसी आयोग को आवश्यक आंकड़े जुटाने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन पूरा करने में लगातार समय लग रहा था। सरकार ने आयोग का कार्यकाल पहले 21 अगस्त 2025 को बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025 किया। इसके बाद 8 जनवरी 2026 को इसे 31 मार्च 2026 तक बढ़ाया गया।
31 मार्च 2026 को सरकार ने आयोग का कार्यकाल एक बार फिर बढ़ाकर 30 सितंबर 2026 कर दिया।
इसका सीधा असर पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण निर्धारण पर पड़ा। आयोग की रिपोर्ट के बिना आरक्षण की अंतिम स्थिति तय करने में कठिनाई आ रही थी।
मई 2026: हाईकोर्ट ने 31 जुलाई तक चुनाव कराने का आदेश दिया
14 नवंबर 2025 के फैसले के बावजूद 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव नहीं हो सके। इसके बाद राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग, स्वायत्त शासन विभाग और राज्य निर्वाचन आयोग ने हाईकोर्ट में समय-सीमा बढ़ाने के लिए आवेदन पेश किए।
इन आवेदनों पर 11 मई को सुनवाई पूरी हुई और 22 मई 2026 को अदालत ने फैसला सुनाया।
सरकार ने अदालत में देरी के पीछे कई कारण बताए। इनमें ओबीसी आयोग की रिपोर्ट लंबित होना, नगरीय निकायों के परिसीमन से जुड़े कानूनी विवाद, आरक्षण निर्धारण और चुनाव कराने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता शामिल थी। सरकार ने गर्मी और आगामी मानसून को भी चुनाव कराने में कठिनाई का कारण बताया।
सरकार ने कहा कि स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए लगभग 3.75 लाख कर्मचारियों की आवश्यकता होगी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में देरी के कारण चुनाव अनिश्चितकाल तक नहीं रोके जा सकते। अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग को सभी स्थानीय निकायों के चुनाव 31 जुलाई 2026 तक पूरे कराने का निर्देश दिया। नगरीय निकायों की मतदाता सूची और वार्ड संबंधी प्रक्रिया 20 जून तक पूरी करने को कहा गया।

जुलाई 2026: सरकार ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र देकर नई समय-सीमा बताई
22 मई के आदेश के बाद भी ओबीसी आरक्षण और चुनाव की तैयारियां समय पर पूरी नहीं हो सकीं। 16 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयुक्त और ओबीसी आयोग के अधिकारी उपस्थित हुए। अदालत ने चुनाव प्रक्रिया की निश्चित समय-सीमा प्रस्तुत करने को कहा।
इसके बाद 19 जुलाई को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसमें पंचायती राज विभाग, स्वायत्त शासन विभाग, ओबीसी आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारी शामिल हुए।
20 जुलाई को सरकार ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र पेश कर नई समय-सारणी प्रस्तुत की।
सरकार की ओर से बताया गया कि ओबीसी आयोग 5 अगस्त तक रिपोर्ट देगा। रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार 10 दिनों में आरक्षण लॉटरी पूरी करेगी। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग 90 दिनों में चुनाव प्रक्रिया पूरी करेगा। इस आधार पर 15 नवंबर 2026 तक चुनाव संपन्न कराने का प्रस्ताव अदालत के सामने रखा गया।
हाईकोर्ट ने ओबीसी आयोग को 5 अगस्त तक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही, स्पष्ट किया कि आयोग की रिपोर्ट नहीं आने की स्थिति में भी आरक्षण लॉटरी की प्रक्रिया नहीं रोकी जाए। अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग को 15 अगस्त तक चुनाव घोषित करने और 15 नवंबर तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करने की दिशा में काम करने को कहा।
जुलाई-अगस्त 2026: ओबीसी सर्वेक्षण और रिपोर्ट
ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आवश्यक आंकड़े जुटाने के उद्देश्य से आयोग ने 10 से 23 जुलाई 2026 तक प्रदेशभर में डिजिटल घर-घर सर्वेक्षण कराया। इस काम में 51 हजार से अधिक कर्मचारियों को लगाया गया। सर्वेक्षण में परिवारों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्थिति और स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित जानकारी जुटाई गई।
5 अगस्त 2026 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सौंप दी। इसके बाद सरकार के लिए आरक्षण निर्धारण और लॉटरी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता खुला।
अगस्त-सितंबर 2026: आरक्षण लॉटरी की तारीखें दो बार बदलीं
सरकार ने पहले 17 और 18 अगस्त को पंचायती राज संस्थाओं के पदों के आरक्षण की लॉटरी कराने का कार्यक्रम बनाया था। लेकिन नगरीय निकाय चुनावों की तैयारियों और अधिकारियों की व्यस्तता के कारण यह प्रक्रिया स्थगित कर दी गई।
इसके बाद 17 और 18 सितंबर की नई तारीखें निर्धारित की गईं। सितंबर में भी कार्यक्रम में बदलाव हुआ और अंततः 23 सितंबर को जिला परिषद, पंचायत समिति और प्रधान पदों तथा 24 सितंबर को सरपंच और वार्ड पंच पदों के आरक्षण की लॉटरी कराई गई।
इस प्रक्रिया के बाद चुनाव की तैयारी अंतिम चरण में पहुंची।
अक्टूबर 2026: हाईकोर्ट की चुनौती के बीच निर्वाचन आयोग ने घोषित किया चुनाव कार्यक्रम
आरक्षण लॉटरी के बाद कुछ पंचायतों में आरक्षण निर्धारण को लेकर विवाद भी सामने आए। एक अक्टूबर को राजस्थान हाईकोर्ट ने भरतपुर और करौली की तीन ग्राम पंचायतों में आरक्षण निर्धारण से संबंधित आदेशों को निरस्त कर नियमों के अनुसार दोबारा प्रक्रिया करने के निर्देश दिए।
इसी बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने 3 अक्टूबर 2026 को पंचायती राज संस्थाओं के आम चुनाव का कार्यक्रम जारी किया। प्रदेश की 41 जिला परिषदों, 457 पंचायत समितियों और 14,403 ग्राम पंचायतों में चुनाव चार चरणों में कराने की घोषणा की गई।
6 अक्टूबर को धनतेरस के मद्देनजर आयोग ने पहले तीन चरणों की मतदान तारीखों में संशोधन किया। चौथे चरण का कार्यक्रम यथावत रखा गया।
संशोधित कार्यक्रम के अनुसार जिला परिषद एवं पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव 22 अक्टूबर, 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 14 नवंबर को निर्धारित किए गए। सरपंच और पंच पदों के चुनाव क्रमशः 24 अक्टूबर, 30 अक्टूबर, 5 नवंबर और 16 नवंबर को रखे गए।
जिला परिषद एवं पंचायत समिति सदस्यों की मतगणना 20 नवंबर को निर्धारित की गई है।





