हरिसेवा सोलह बरस, गुरु सेवा पल चार…

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परमेश्वर से भी बड़ा है गुरु 

शिक्षक दिवस विशेष 

 

 

 

 

 

 

✍️ डॉ. सत्यवीर सिंह

प्रोफेसर (हिन्दी)

लाल बहादुर शास्त्री राजकीय महाविद्यालय, कोटपूतली

भारतीय मनीषा के सुदूर अतीत से लेकर आज के आधुनिक कोलाहल तक, एक शब्द है जो सदा शांत, स्निग्ध और प्रकाशमान रहा है, वह है—‘शिक्षक’। हमारे देश की सांस्कृतिक चेतना में शिक्षक को माता-पिता से भी ऊपर और साक्षात् ईश्वर से भी अधिक श्रद्धेय भाव से देखा जाता रहा है।

गोविन्द के रूप में

सृष्टि के नियंता, जग के पालनहार, साक्षात् परमेश्वर से भी बढ़कर यदि किसी को स्थान मिला है, तो वह केवल गुरु ही हैं। यही कारण है कि हमारा संपूर्ण वाङ्मय, हमारे काव्य-ग्रंथ और पौराणिक वांग्मय की ऋचाएँ शिक्षक की महिमा के दिव्य गुणगान से भरी हुई हैं।प्राचीनकालीन संस्कृत वाङ्मय के स्वर्णिम पृष्ठों से लेकर समकालीन समाज तक, गुरु के महत्व और उसकी कालजयी भूमिका को हर धर्म, हर संस्कृति और हर विचार ने सहर्ष शिरोधार्य किया है।

शिक्षक का ज्ञान प्रसाद

मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन के संतों और अनन्य भक्तों एवं सूफी कवियों ने ने तो गुरु के ‘प्रसाद’ यानी उनकी अहैतुकी कृपा के बिना जीवन का एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाया। सूफी कवि जायसी कहते हैं कि इस संसार के गहन और रहस्यमयी सत्य को केवल गुरु की दिव्य दृष्टि से ही समझा जा सकता है। तुलसीदास जी ने तो अपने सच्चे गुरु को साक्षात् ‘कृपा का समुद्र’ और ‘नर रूप में नारायण’ बताते हैं। भक्त शिरोमणि सूरदास जी अपने आराध्य और गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य के प्रति अनुराग दिखाते हुए लिखते हैं कि गुरु के चरणों के नखों की चंद्र-छटा के बिना इस संसार में केवल और केवल अज्ञान का घोर अंधकार है।

मरुमंदाकिनी, प्रेम और विरह की साक्षात् प्रतिमूर्ति कवयित्री मीराबाई अपने गुरु संत रैदास के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहती हैं कि मुझे तो गुरु रैदास जी मिल गए, जिन्होंने मुझे ज्ञान की ऐसी ‘गुटकी’ अर्थात् दिव्य ओषधि दे दी, जिससे भवसागर पार हो गया। इसी महान संत परंपरा की अगली कड़ी में आधुनिक काल के संत शिरोमणि चरणदास महाराज अपनी साधना का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए कहते हैं – “हरिसेवा सोलह बरस, गुरु सेवा पल चार। तो भी नहीं बराबरी, बेदन कियौ विचार।” ऐसा वेदों और ऋषियों का गहन विचार है। यह सब यकायक या अचानक उपजा हुआ विमर्श नहीं है बल्कि यह भारत की एक अनवरत बहती हुई जीवित और जाग्रत परंपरा रही है, जिसके अमिट प्रमाण हमारे साहित्य और इतिहास के पन्नों पर अंकित हैं।

चरित्र निर्माता

इतिहास गवाह है कि समय-समय पर अनेक महान शिक्षकों ने अनगिनत साधारण व्यक्तियों के भीतर छिपी असाधारणता को निखारा। उन्होंने ऐसे चरित्रों का निर्माण किया, जिन्होंने आगे चलकर अत्यंत शांतिपूर्ण और न्यायप्रिय तरीके से विशाल एवं विस्तृत साम्राज्यों को अस्तित्व में लाए।

ज्ञान शिल्पी
यदि हम वैश्विक और भारतीय इतिहास पर दृष्टिपात करें तो सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, शुक्राचार्य, महर्षि वाल्मीकि, शौनक, अगस्त्य, कपिल, भगवान परशुराम, आचार्य द्रोणाचार्य, सांदीपनि, व्याकरणाचार्य पाणिनि, कूटनीति के पुरोधा चाणक्य, रूसो, वॉल्टेयर, दांते आदि ऐसे नाम हैं, जिन्होंने समय की धारा को मोड़ दिया। इन गुरुओं ने अपने ज्ञान की भट्टी में तपाकर ऐसे राजाओं, सम्राटों और विचारकों को तराशा, जिन्हें आज भी मानवता के सजग प्रहरियों और पुजारियों के रूप में बड़े आदर से स्मरण किया जाता है। इन कालजयी भारतीय शिक्षकों की पावन उपस्थिति और उनके आध्यात्मिक, बौद्धिक अवदान के कारण ही इस पुण्यभूमि भारत को विश्व पटल पर ‘विश्व गुरु’ का गौरवशाली खिताब हासिल हुआ है।

आदिम चेतना का साक्षी
शिक्षक ही आदि से अंत तक हमारी आदिम चेतना का साक्षी रहा है। यही कारण है कि हमारे देश में एक शिक्षक केवल एक नौकरीपेशा ‘टीचर’ नहीं होता, वह ‘गुरु’ होता है। गुरु शब्द में एक अलौकिक गुरुता है। एक दिव्य गौरव का भाव है। इसीलिए कबीर आदि महापुरुषों ने गुरु को गोविंद से भी उच्चतर आसन पर बैठाया है।
वात्सल्य भाव
हमारे समृद्ध वाङ्मय में गुरु और शिष्य के मध्य बहने वाले आत्मीय प्रेम के ऐसे अलौकिक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ गुरु की अनुपस्थिति में शिष्य एक पल भी जीवित रहने की कल्पना नहीं कर पाता। यह संबंध ठीक वैसा ही है जैसे कोई छोटा अबोध शिशु अपनी माँ के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया और उनके परम प्रिय शिष्य अमीर खुसरो का आपसी प्रेम इस आत्मिक एकात्मता का सबसे अनुपम और जीवंत प्रमाण है। इतिहास गवाह है कि जब सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने इस नश्वर संसार को छोड़ा, तो उनके निधन के मात्र चौबीस घंटे के भीतर ही, विरह की अग्नि में जलते हुए अमीर खुसरो ने भी अपने प्राण त्याग दिए।
संत कबीरदास जी ने तो ऐसे अभागे व्यक्ति को ‘अंधा’ (परम अज्ञानी) तक कह दिया है, जो गुरु के बिना ही ज्ञान का संचय करने का दंभ भरते हैं। इतिहास साक्षी है कि जिन शिष्यों के सिर से गुरु की कृपा का वरदहस्त उठ गया, उन्हें इस लोक या परलोक में कहीं भी शरण नहीं मिलती। इसीलिए, गुरु का प्रसाद, उनका पावन आशीर्वाद, उनका पावन स्नेह और वात्सल्यपूर्ण प्रेम हमारे जीवन की यात्रा के लिए सदैव अनिवार्य और अपरिहार्य है।

अंत में कबीरदास जी की यह कालजयी साखी गुरुमहिमा की समग्रता को अपने भीतर समेटे हुए साक्षात् गूँजती प्रतीत होती है- “कबीरा ते नर अंध हैं, जो गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।।” भारतीय अध्यात्म में गुरु को भगवान और शिष्य के बीच का सेतु माना जाता है।


व्यक्तित्व निर्माता
भारतवर्ष ‘आचार्य देवो भव: की पावन संस्कृति को जीने वाला देश है। यहाँ शिक्षक एक दिव्य कल्पवृक्ष की तरह होता है, जिसके साए में बैठकर शिष्य अपने सुंदर भविष्य के निर्माण हेतु मनचाहा फल प्राप्त करता है। वह पतितपावनी गंगा की तरह पाक-साफ, निर्मल, निष्कलुष और मोक्षदाता होता है, जो शिष्य के विकारों को धो डालता है। वह सूर्यदूत की भाँति जीवन के गहन तम और अज्ञान को चीरकर चारों ओर ज्ञान का आलोक फैलाता है। शिक्षक चंद्रमा की तरह भी होता है, अत्यंत शीतल, शांत और सुखद। जिस प्रकार घने अंधकार में भटकते हुए यात्रियों को चंद्रमा अपनी मंद-मंद चांदनी से राह दिखाता है, ठीक उसी प्रकार जीवन रूपी इस जटिल निशा में भटके हुए मनुष्यों का पथ-प्रदर्शन चंद्रमा रूपी गुरु ही करता है।

वह एक दीपक की तरह भी है, जो स्वयं को तिल-तिल जलाता है, खुद को स्वाहा कर देता है, ताकि उसके शिष्य का घर-आँगन और भविष्य सदा आलोकित रहे। वास्तव में, एक सच्चे गुरु की वास्तविक पूँजी धन-दौलत नहीं, बल्कि उसके वे सुयोग्य और संस्कारी शिष्य होते हैं, जो उसकी ज्ञान-परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर गतिशील बनाए रखते हैं।

आदर्श शिक्षक के गुण
एक आदर्श शिक्षक को स्वयं भी कैसा होना चाहिए? इसके लिए आवश्यक है कि उसे सदैव ज्ञान का पिपासु, अत्यंत कल्पनाशील, सहृदय, निःस्वार्थी, निष्कलुष, पूर्णतः निष्पक्ष, छात्र हितैषी, प्रजा हितैषी तथा नित्य नए विचारों को अपनाने वाला होना चाहिए। एक सच्चा शिक्षक समाज के भीतर रहकर भी समाज से बहुत कुछ सीख सकता है।
कबीरदास जी के शब्दों में, गुरु का व्यवहार एक कुशल कुंभकार (कुम्हार) की भाँति होना चाहिए- “ज्यों कुम्हार माटी गढ़े, साजि-साजि कढ़े नेह। भीतर हाथ सँवारि दै, बाहर मारे ठेह।।” (मूल भाव यह कि जैसे कांचे भांडे सों रहे, ज्यों कुम्हार को नेह। भीतर सो रक्षा करें, बाहर चौटे देह।) कुम्हार जब मिट्टी के कच्चे घड़े को आकार देता है तो वह बाहर से तो थाप मारता है (कठोर अनुशासन रखता है) लेकिन घड़ा टूट न जाए, इसलिए भीतर से अपना कोमल हाथ लगाकर उसे सहारा भी देता है।
एक गुरु को बढ़ई की तरह होना चाहिए, जो लकड़ी के खुरदरेपन और उसकी कमियों को बड़े प्रेम और धैर्य से छीलकर उसे अत्यंत चिकना, सुंदर, उपयोगी और आकर्षक बना देता है। गुरु को एक मूर्ति-शिल्पी की तरह होना चाहिए। शिल्पी एक बेजान, बेडौल और अनगढ़ पत्थर पर अपनी छैनी से चोट कर करके उसमें से एक अत्यंत सुंदर और जीवंत मूर्ति को तराश देता है। जिसे आगे चलकर संपूर्ण संसार पूजता है और श्रद्धा से सिर झुकाता है। सच देखा जाए तो वह पूजा केवल उस पाषाण रूपी भगवान की नहीं बल्कि उस भगवान को आकार देने वाले कुशल शिल्पी (गुरु) की भी होती है।

गुरु को ग्रामीण परिवेश में दूध मथने वाली मंथनकार महिला की भाँति भी होना चाहिए। उस अनपढ़ देहाती महिला को यह भली-भाँति ज्ञात होता है कि मथनी को कब, कितना तेज और कब कितना धीरे झटका देना है ताकि छाछ अलग हो जाए और दिव्य माखन घी ऊपर तैरने लगे। एक गुरु को भी अपने शिष्यों के साथ परिस्थितियों के अनुरूप कभी नरम तो कभी गरम व्यवहार प्रदर्शित करके, उन्हें भविष्य का एक सुदृढ़ निर्माता बनाना चाहिए

राष्ट्र निर्माता
किसी भी राष्ट्र के प्रशासनिक संचालन के लिए व्यवस्थाएँ अनेक अधिकारी, कर्मचारी और नेता तो तैयार कर सकती हैं, लेकिन एक जीवंत और संस्कारी ‘राष्ट्र’ का निर्माण करने का एकाधिकार ईश्वर ने केवल एक ही व्यक्ति को सौंपा है—और वह है ‘गुरु’। गुरु (शिक्षक) ही राष्ट्र का वास्तविक निर्माता होता है।
शिक्षक की साक्षात कृपा और मार्गदर्शन से ही राम और कृष्ण जैसी ईश्वरीय शक्तियाँ इस धरती पर अवतरित होकर मर्यादा और कर्म का संदेश दे पाती हैं। गुरु के ही आशीर्वाद रूपी प्रसाद से स्वामी विवेकानंद, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, सूरदास, तुलसीदास, कबीर, गुरु नानक, मीराबाई, संत रैदास, दादूदयाल, संत सुंदरदास, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और सिकंदर महान जैसी कालजयी विश्व-विभूतियाँ इतिहास के क्षितिज पर चमकती हैं।
महाकवि मैथिलीशरण गुप्त जी तो अपने काव्य गुरु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रति अपनी कृतज्ञता को सार्वजनिक मंचों पर सहर्ष स्वीकार करते थे। वे मानते थे कि जिस प्रकार महाकवि तुलसीदास जी को संकटमोचन हनुमान जी का आशीर्वाद मिला तो उन्होंने अमर ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ की रचना कर दी; ठीक उसी प्रकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के वरदहस्त और आशीर्वाद से ही गुप्त जी को आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रतिनिधि कवि और ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में अमिट ख्याति प्राप्त हुई। गुप्त जी ने बड़ी विनम्रता से द्विवेदी जी का आभार इन पंक्तियों में व्यक्त किया है- “तुलसी भी करते भला कैसे मानसनाद। महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद।।”
इसी तरह, क्या स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसी तपस्या और दिव्य संरक्षण के बिना नरेंद्र नाम का एक साधारण नवयुवक ‘स्वामी विवेकानंद’ बन पाता? क्या उन्हें वह वैश्विक ख्याति और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा प्राप्त हो पाती, जो उन्हें शिकागो से लेकर पूरे विश्व में मिली? कदापि नहीं।
गुरु के महत्व, समाज-निर्माता, राष्ट्र-निर्माता और युग-प्रवर्तक के रूप में उसकी दिव्य भूमिका पर तनिक भी संदेह या संशय की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। गुरु का पद और उसका आसन मानव समाज में सर्वोपरि, सर्वोच्च और वंदनीय है। गुरु के स्नेह और उसके मार्गदर्शन के अभाव में किसी भी व्यक्ति के कुशल, सुसंस्कृत और संतुलित व्यक्तित्व के निर्माण की कल्पना करना ही पूर्णतः बेमानी और व्यर्थ है।

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